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Saturday, 6 June 2026

भारतीय संविधान: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार एवं पंथनिरपेक्षता (अनुच्छेद 25, पंथ बनाम धर्म और वैश्विक तुलना) UPSC NOTES

  📜 भारतीय संविधान: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार एवं पंथनिरपेक्षता (अनुच्छेद 25, पंथ बनाम धर्म और वैश्विक तुलना)


🏛️ भाग 1: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 25(1)

यह अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति (नागरिक और गैर-नागरिक) को अंतःकरण (Conscience) की स्वतंत्रता और किसी भी पंथ/धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है।

* मानने का अधिकार:-   अपनी धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों को सार्वजनिक रूप से बिना किसी डर के स्वीकार करने की घोषणा करना।

* आचरण का अधिकार:-   अपने पंथ के सिद्धांतों के अनुसार पूजा-पाठ, परंपराएं, अनुष्ठान या समारोह आयोजित करना।

* प्रचार का अधिकार:-  अपने पंथ के विचारों को दूसरों तक पहुंचाना और समझाना।

* ⚠️ महत्वपूर्ण कानूनी वाद (स्टैनिसलॉस वाद): उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 'प्रचार के अधिकार' में किसी अन्य व्यक्ति का जबरन या प्रलोभन देकर 'धर्मांतरण' (Conversion) कराने का अधिकार शामिल नहीं है। ओडिशा और मध्य प्रदेश राज्यों द्वारा बनाए गए धर्मांतरण विरोधी कानून पूरी तरह संवैधानिक हैं।



## 🔍 पंथ/धर्म के लक्षण: उच्चतम न्यायालय की व्याख्या

सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्याख्या करते हुए पंथ के दो लक्षण बताए हैं:

   1. मूल लक्षण (Essential Feature): यह पंथ के मुख्य सिद्धांतों, नैतिक विचारों और मूल मान्यताओं से संबंधित है (जैसे- अंतःकरण की शुद्धता)। इस पर राज्य आसानी से रोक नहीं लगा सकता।

   2. गौण लक्षण (Secondary Feature): यह बाहरी रीति-रिवाजों जैसे- पटाखा फोड़ना, लाउडस्पीकर का उपयोग, या पशुबलि से संबंधित है। राज्य इन्हें सार्वजनिक हित में नियंत्रित/प्रतिबंधित कर सकता है।



## 🚫 धार्मिक स्वतंत्रता पर तार्किक प्रतिबंध [अनुच्छेद 25(1)]

धार्मिक स्वतंत्रता असीमित (Absolute) नहीं है। राज्य निम्नलिखित तीन आधारों पर इस पर प्रतिबंध लगा सकता है:

* लोक व्यवस्था (Public Order)

* सदाचार (Morality)

* स्वास्थ्य (Health)


## ⚙️ सामाजिक सुधार और राज्य का नियंत्रण [अनुच्छेद 25(2)]

राज्य को यह अधिकार प्राप्त है कि वह:-

* पंथनिरपेक्ष विषय: आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को कानून बनाकर विनियमित (Regulate) या नियंत्रित कर सकता है।

* सामाजिक सुधार: सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बना सकता है। इसके तहत हिंदू धार्मिक संस्थानों (जैसे मंदिरों) को समाज के सभी वर्गों/जातियों के लिए समान रूप से खोला जाएगा।


## ⚖️ भाग 2: पंथनिरपेक्ष राज्य (Secular State) एवं धर्म बनाम पंथ

1. धर्म (Dharma) और पंथ (Religion) में अंतर...........

* धर्म (Dharma): यह संकीर्ण नहीं है। इसका अर्थ नैतिकता, कर्तव्य, सदाचार, सही मार्ग को धारण करना और जीवन के मूल तत्वों से है।

* पंथ (Religion): यह पारलौकिक ईश्वर, विशिष्ट पूजा स्थल (मंदिर/मस्जिद/चर्च) और एक निश्चित पवित्र ग्रंथ (गीता/कुरान/बाइबल) से जुड़ी व्यवस्था है। भारत का राज्य किसी पंथ से नहीं जुड़ा है, लेकिन वह 'धर्म' (नैतिकता) के सिद्धांतों पर चलता है।


 2. भारतीय पंथनिरपेक्षता और एस.आर. बोम्मई वाद (S.R. Bommai Case)

सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाद में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए घोषित किया कि "पंथनिरपेक्षता (Secularism) भारतीय संविधान का आधारभूत ढांचा (Basic Structure) है।"

 इसके दो मुख्य आयाम हैं:............

* नकारात्मक आयाम: पंथ और राज्य के बीच पूर्ण अलगाव (Separation)।

* सकारात्मक आयाम: राज्य द्वारा सभी पंथों के प्रति समान सम्मान व्यक्त करना (सर्वधर्म समभाव)।

* उदाहरण: भारत में सेना या सरकारी नौकरियों में सभी पंथों के गुरुओं/पुजारियों/मौलवियों की भर्ती की जाती है और सभी त्योहारों पर राज्य द्वारा छुट्टियां दी जाती हैं।



## 🌍 भाग 3: भारत, अमेरिका और फ्रांस के पंथनिरपेक्ष मॉडल की तुलना

| देश | पंथनिरपेक्षता का स्वरूप (Nature) | राज्य और पंथ का संबंध | विशेष बिंदु |

| अमेरिका | दोतरफा अलगाव (Wall of Separation) | न तो राज्य पंथ के मामलों में हस्तक्षेप करेगा और न ही पंथ राज्य के कार्यों में दखल देगा। | पूर्ण और कठोर अलगाव। |

| फ्रांस | एकतरफा अलगाव (लाइसीते - Laïcité) | पंथ राज्य या सार्वजनिक जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन राज्य पंथ के मामलों को नियंत्रित कर सकता है। | शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक प्रतीकों (जैसे हिजाब, क्रॉस) पर पूर्ण प्रतिबंध। |

| भारत | सैद्धांतिक दूरी (Principled Distance) | राज्य सभी पंथों से समान दूरी बनाए रखता है, परंतु सामाजिक सुधार और न्याय के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। | अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार (अनुच्छेद 29, 30) और बहुधार्मिक समाज की मान्यता। |


📝 निष्कर्ष: पंथनिरपेक्षता भारतीय संविधान में अंतर्निहित स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों का विस्तार है, जो भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक समाज के ताने-बाने को अक्षुण्ण रखने के लिए अत्यधिक उपयोगी और व्यावहारिक है।

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📝 UPSC Mains Practice Question (मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न)

प्रश्न:- "पश्चिमी पंथनिरपेक्षता (Secularism) जहाँ राज्य और धर्म के बीच पूर्ण अलगाव की वकालत करती है, वहीं भारतीय मॉडल 'सैद्धांतिक दूरी' और 'सकारात्मक हस्तक्षेप' पर आधारित है।" प्रमुख न्यायिक निर्णयों और वैश्विक तुलना के प्रकाश में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

Ans:- 

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