डेली न्यूज़ (03 Jun, 2026)
वर्ष 2035 के लिये भारत का सेमीकंडक्टर विज़न
प्रारंभिक परीक्षा: नीति आयोग, सेमीकंडक्टर, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) चिप, राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष, वेफर फैब्रिकेशन
मेन्स के लिये: सेमीकंडक्टर विज़न 2035 और इसके निर्धारित लक्ष्य, भारत की 5P सेमीकंडक्टर रणनीति
चर्चा में क्यों?
नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब (FTH) ने “भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य” नामक रिपोर्ट जारी की, जिसमें भारत के सेमीकंडक्टर विज़न 2035 तथा देश को वैश्विक स्तर पर एक अनिवार्य सेमीकंडक्टर राष्ट्र बनाने के लिये एक रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत किया गया है।
- यह रिपोर्ट ऐसे महत्त्वपूर्ण समय पर आई है जब केंद्रीय बजट 2026 में ISM 2.0 (इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0) की घोषणा की गई है, जो पारिस्थितिकी तंत्र की शुरुआत से आगे बढ़कर उसे और अधिक गहराई देने की दिशा में एक निर्णायक बदलाव का संकेत देती है।
सारांश
- भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक 120–150 अरब अमेरिकी डॉलर के सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला (Value Chain) का विकास करना है। इसके अंतर्गत आत्मनिर्भरता को सशक्त बनाना, चिप डिज़ाइन, OSAT (आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एवं टेस्टिंग) और उन्नत पैकेजिंग में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करना तथा SiC (सिलिकॉन कार्बाइड) और GaN (गैलियम नाइट्राइड) सामग्रियों में प्रमुख वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करना है।
- इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये भारत 5P रणनीति (अग्रणी, नीति और निवेश, उत्पादन, लोग तथा साझेदारी) का उपयोग करेगा, साथ ही तकनीक, प्रतिभा, पूंजी एवं बुनियादी ढाँचे से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करेगा व AI चिप डिज़ाइन, उन्नत पैकेजिंग, कंपाउंड सेमीकंडक्टर और क्वांटम प्रौद्योगिकियों जैसे अवसरों पर ध्यान केंद्रित करेगा।
वर्ष 2035 के लिये भारत का सेमीकंडक्टर विज़न क्या है?
- भारत का सेमीकंडक्टर विज़न 2035: भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक 120–150 अरब अमेरिकी डॉलर का सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला विकास करना है, जो तीन स्तंभों पर आधारित है:
- रणनीतिक आत्मनिर्भरता: परिपक्व और कंपाउंड सेमीकंडक्टर नोड्स में प्रभुत्व स्थापित करना तथा चुनिंदा रूप से उन्नत नोड्स को विकसित करना।
- पारिस्थितिकी तंत्र की मज़बूती: चिप डिज़ाइन, आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) तथा उन्नत पैकेजिंग में वैश्विक नेतृत्व के रूप में उभरना।
- वैश्विक अनिवार्यता: वाइड-बैंडगैप सामग्रियों (गैलियम नाइट्राइड (GaN) और सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) चिप) के एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्त्ता बनना, जिन्हें वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ अनिवार्य रूप से आवश्यक मानती हैं।
- वर्ष 2035 तक के प्रमुख मात्रात्मक लक्ष्य: वैश्विक सेमीकंडक्टर चिप बाज़ार में 10–13% हिस्सेदारी प्राप्त करना।
- OSAT और उन्नत पैकेजिंग के लिये शीर्ष-3 वैश्विक गंतव्य बनना।
- वर्ष 2035 तक देश की कुल चिप मांग का 35–50% स्वदेशी उत्पादन के माध्यम से पूरा करने की क्षमता विकसित करना।
- भारत में उपभोग होने वाले प्रत्येक चिप के कुल मूल्य का 55–70% हिस्सा डिज़ाइन, पैकेजिंग और सामग्रियों के निर्माण के माध्यम से देश में ही अर्जित करना।
- AI, क्वांटम और उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग (HPC) चिप डिज़ाइन में 100+ उन्नत बौद्धिक संपदा (IP) विकसित करना।
- 50+ देशों में किफायती 5G/6G फोन, एज CPU, माइक्रोकंट्रोलर और सेंसर के लिये चिप का निर्यात करना।
- सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) और गैलियम नाइट्राइड (GaN) जैसी वाइड-बैंडगैप सामग्रियों के शीर्ष वैश्विक आपूर्तिकर्त्ता बनना।
विज़न 2035 प्राप्त करने के लिये भारत की 5P सेमीकंडक्टर रणनीति क्या है?
- अग्रणी:
- उद्देश्य: कंपाउंड चिप (SiC, GaN, डायमंड), उन्नत पैकेजिंग और 2.5D/3D इंटीग्रेशन (सेमीकंडक्टर पैकेजिंग तकनीकों) में स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा डिज़ाइन क्षमताओं का निर्माण करना।
- अल्प अवधि: इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स/आईपी तक संप्रभु पहुँच प्रदान करना, एक राष्ट्रीय सह-डिज़ाइन प्लेटफॉर्म शुरू करना तथा स्वचालन हेतु AI (EDA/पैकेजिंग के लिये AI) को लागू करना।
- मध्यम अवधि: राष्ट्रीय फ्रंटियर सेमीकंडक्टर अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत IITs, IIS तथा CSIR प्रयोगशालाओं में सरकार द्वारा वित्तपोषित “सेंटर ऑफ कन्वर्जेंस” की स्थापना करना।
- दीर्घ अवधि: पेटेंट प्रोत्साहन और एक संप्रभु निधि के समर्थन से रणनीतिक बौद्धिक संपदा (IP) एवं पेटेंट कार्यक्रम संचालित करना।
- नीति और निवेश:
- पूंजी आवश्यकता: इस दृष्टि के तहत अगले एक दशक में 135–180 अरब अमेरिकी डॉलर की संचयी पूंजी निवेश की परिकल्पना की गई है, जिसमें केंद्र सरकार निजी निवेश के जोखिम को कम करने के लिये लगभग एक-तिहाई (45–60 अरब अमेरिकी डॉलर) निवेश का आधार प्रदान करेगी।
- अल्प अवधि: एक स्वायत्त राष्ट्रीय नोडल एजेंसी, सिंगल-विंडो अनुमोदन प्रणाली तथा बहुवर्षीय नीति ढाँचे के माध्यम से शासन व्यवस्था को स्थिर और सुदृढ़ बनाना।
- मध्यम अवधि: पूर्ण-स्तरीय (Full Stack) प्रोत्साहन व्यवस्था लागू करना तथा रक्षा, दूरसंचार, रेलवे, ऊर्जा और ऑटोमोबाइल जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में चरणबद्ध रूप से स्वदेशी चिपों के उपयोग को अनिवार्य बनाना।
- दीर्घ अवधि: वैश्विक निर्यात को बढ़ावा देने के साथ-साथ सेमीकंडक्टर सहायता कोष और राष्ट्रीय निवेश एवं अवसंरचना कोष (NIIF) के विशेष प्रभाग के माध्यम से राष्ट्रीय पूंजी ढाँचे को क्रियान्वित करना।
- उत्पादन:
- मुख्य फोकस: वेफर फैब्रिकेशन (Wafer Fabrication), उन्नत पैकेजिंग/OSAT, महत्त्वपूर्ण सब्सट्रेट्स तथा सुरक्षित विनिर्माण क्षमताओं को प्राथमिकता देना।
- अल्प अवधि: मानकीकृत बुनियादी सुविधाओं और ऊर्जा आपूर्ति के लिये लघु मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टरों से युक्त राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर क्षेत्र (NSZ) की स्थापना करना।
- मध्यम अवधि: राष्ट्रीय उन्नत पैकेजिंग केंद्र (NCAP) के माध्यम से उन्नत पैकेजिंग क्षमताओं को सुदृढ़ करना तथा लक्षित फैब (Fab) पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना।
- दीर्घ अवधि: अत्यधिक संवेदनशील रक्षा एवं एयरोस्पेस चिप के निर्माण हेतु एयर-गैप्ड नेटवर्क से युक्त सुरक्षित फैब्स को संचालित करना।
- लोग:
- तात्कालिक आवश्यकता: हार्डवेयर पारिस्थितिकी तंत्र में प्रतिभा विकास की प्रक्रिया लंबी होने के कारण, कौशल विकास (Skilling) पहलों को शीघ्र आरंभ करना अत्यंत आवश्यक है।
- फोर-लेयर टैलेंट पिरामिड:
- स्तर 1 (तकनीशियन): क्लीनरूम संचालन और यील्ड प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय फैब अकादमी तथा पॉलिटेक्निक/आईटीआई डिप्लोमा नेटवर्क की स्थापना करना।
- स्तर 2 (इंजीनियर): विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को अद्यतन करते हुए टेप-आउट (Tape-out) और पैकेजिंग इंटीग्रेशन का अनिवार्य व्यावहारिक अनुभव शामिल करना।
- स्तर 3 (शोधकर्त्ता): IIT और IISc में नैनोइलेक्ट्रॉनिक्स केंद्रों का उन्नयन कर उन्नत सामग्री विज्ञान के शोधकर्त्ताओं को समर्थन प्रदान करना।
- स्तर 4 (आर्किटेक्ट/विशेषज्ञ डिज़ाइनर): उच्च स्तर के अनुभवी भारतीय प्रवासी पेशेवरों को आकर्षित करने हेतु वैश्विक प्रतिभा समावेशन कार्यक्रम संचालित करना।
- साझेदारी:
- अल्प अवधि: वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के दौरान सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिये आवश्यक DUV (डीप अल्ट्रावायलेट) और EUV (एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट) लिथोग्राफी प्रौद्योगिकियों तक निर्बाध पहुँच सुनिश्चित करने हेतु अमेरिका, जापान, यूरोपीय संघ (EU) तथा दक्षिण कोरिया जैसे विश्वसनीय प्रौद्योगिकी समूहों के साथ रणनीतिक भू-राजनीतिक साझेदारियों को सुदृढ़ करना।
- मध्यम अवधि: परिपक्व-नोड फैब्स और OSAT इकाइयों के विकास हेतु वैश्विक विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारियाँ, संकाय विनिमय कार्यक्रम तथा औद्योगिक संयुक्त उपक्रम शुरू करना।
- दीर्घ अवधि: भारतीय अनुसंधान एवं विकास (R&D) को विश्व के अग्रणी वैश्विक संघों (जैसे IMEC, फ्रैउनहोफर-जैसे मॉडल) के साथ जोड़ना (एम्बेड करना) और संसाधन-समृद्ध देशों (विशेष रूप से अफ्रीका में) के साथ कच्चे माल की खरीद के दीर्घकालिक समझौते करना।
वैश्विक सेमीकंडक्टर परिदृश्य में भारत की स्थिति क्या है?
- वैश्विक परिदृश्य: वर्ष 2024 में सेमीकंडक्टर बाज़ार 631 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जिसके 8.5% की वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर (CAGR) से बढ़ते हुए वर्ष 2035 तक 1.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
- मांग के प्रमुख चालक निम्नलिखित हैं:
- AI-केंद्रित कंप्यूटिंग (GPUs, NPUs, AI एक्सीलरेटर)
- 5G/6G टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर
- इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) और एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS)
- डेटा सेंटर और क्लाउड कंप्यूटिंग
- औद्योगिक ऑटोमेशन और (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) IoT
- एज कंप्यूटिंग और स्मार्ट डिवाइस
- सेमीकंडक्टर की मांग सामान्य प्रयोजन चिप से हटकर विशेष कार्यों और अनुप्रयोगों के लिये डिज़ाइन की गई अनुप्रयोग-विशिष्ट चिप आर्किटेक्चर की ओर बढ़ रही है।
- भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों (कोविड-19, अमेरिका-चीन प्रौद्योगिकी प्रतिद्वंद्विता) ने देशों को सुदृढ़ घरेलू सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिये प्रेरित किया है।
भारत और सेमीकंडक्टर
- उच्च आयात निर्भरता: भारत अपनी सेमीकंडक्टर आवश्यकता का लगभग 90–95% आयात करता है, जिससे देश वैश्विक आपूर्ति शृंखला में बड़े जोखिम और अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
- भारत ने वित्त वर्ष 2017 से वित्त वर्ष 2025 के बीच सेमीकंडक्टर आयात पर कुल लगभग 150 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किये हैं। ये आयात 23% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहे हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो वर्ष 2035 तक वार्षिक आयात लागत 240 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच सकती है।
- घरेलू मांग में वृद्धि: भारत में सेमीकंडक्टर की मांग 19% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है, जिसके अनुसार यह लगभग FY2030 तक 90 अरब अमेरिकी डॉलर और FY2035 तक 200+ अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच सकती है।
- डिज़ाइन और विनिर्माण क्षमताएँ: भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर डिज़ाइन कार्यबल में लगभग 20% का योगदान देता है, जोकि एक ऐसा संरचनात्मक लाभ है जिसका सामना कुछ ही देश कर सकते हैं।
- भारत के पहले फैब्रिकेशन प्लांट (धोलेरा, गुजरात में) में वर्ष 2028 तक उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
- पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिये सरकारी पहलें:
- ISM और ISM 2.0: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत स्थापित, यह चिप विनिर्माण सुविधाओं के लिये वित्तीय सहायता के माध्यम से भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने वाली नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
- केंद्रीय बजट 2026 में घोषित ISM 2.0 का ध्यान पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण से परे क्षमता विस्तार पर केंद्रित हो गया है, जिसमें एडवांस्ड पैकेजिंग, ओसैट (OSAT), डिज़ाइन बुनियादी ढाँचे और कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स पर बल दिया गया है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: घरेलू उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिये बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और आईटी हार्डवेयर के लिये PLI योजना।
- इलेक्ट्रॉनिक घटकों और सेमीकंडक्टर्स के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना (SPECS): इसके अंतर्गत घटक और सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत किया गया।
- इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (EMC और EMC 2.0): इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिये बुनियादी ढाँचे और पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित किया गया।
- सार्वजनिक खरीद (मेक इन इंडिया को प्राथमिकता) आदेश, 2017: सरकारी खरीद में घरेलू स्तर पर निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देता है।
- डिज़ाइन आधारित प्रोत्साहन (DLI) योजना: यह फैबलेस कंपनियों, सेमीकंडक्टर IP डेवलपमेंट और डिज़ाइन मैनपॉवर के विस्तार का समर्थन करती है।
- डिजिटल इंडिया RISC-V कार्यक्रम: बिना किसी लाइसेंस लागत के ओपन-सोर्स प्रोसेसर विकास को बढ़ावा देता है।
- चिप टू स्टार्टअप (C2S) कार्यक्रम: विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप्स के लिये उन्नत डिज़ाइन टूल्स और फैब्रिकेशन (विनिर्माण सुविधाओं) तक पहुँच को सक्षम बनाता है।
- ISM और ISM 2.0: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत स्थापित, यह चिप विनिर्माण सुविधाओं के लिये वित्तीय सहायता के माध्यम से भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने वाली नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
- घरेलू सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता: भारत की भारी आयात निर्भरता वैश्विक आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के प्रति एक गंभीर संवेदनशीलता उत्पन्न करती है, जिससे एक घरेलू सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक प्राथमिकता बन जाता है।
- यह निर्भरता एक बड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम पैदा करती है, क्योंकि UAV, नौसैनिक और हवाई प्रणालियों जैसे मुख्य रक्षा प्लेटफॉर्म विदेशी निर्मित घटकों पर निर्भर हैं, जबकि इसके साथ ही यह विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट का कारण भी बनती है।
- एक घरेलू विनिर्माण आधार स्थापित करने से इन सुरक्षा और वित्तीय देनदारियों को कम किया जा सकेगा, साथ ही उत्पादन लागत को कम करके लाखों लोगों के लिये उन्नत 5G/6G डिजिटल उपकरणों को किफायती बनाकर व्यापक सामाजिक उत्थान को बढ़ावा मिलेगा।
भारत के सेमीकंडक्टर विज़न 2035 को हासिल करने में क्या चुनौतियाँ हैं?
- तकनीकी चुनौतियाँ: चिप डिज़ाइन की उच्च जटिलता, महँगे EDA टूल्स पर निर्भरता और तेज़ी से होते तकनीकी बदलावों के कारण प्रतिस्पर्द्धा में बने रहना कठिन हो जाता है।
- टैलेंट (प्रतिभाशाली कार्यबल) की कमी: लिथोग्राफी, फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग, टेस्टिंग और सेमीकंडक्टर अनुसंधान एवं विकास (R&D) में कुशल पेशेवरों की सीमित उपलब्धता।
- संसाधनों की कमी: सेमीकंडक्टर विनिर्माण में अत्यधिक ऊर्जा और जल की खपत होती है, जिसके लिये विश्वसनीय बुनियादी ढाँचे तथा सतत संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
- लंबी गर्भाधान अवधि: सेमीकंडक्टर फैब्स को शुरू होने में आमतौर पर 4-5 वर्ष लगते हैं, जबकि फैबलेस कंपनियों को भी लाभ कमाने की स्थिति में आने के लिये कई वर्षों की आवश्यकता होती है।
- उच्च पूंजीगत आवश्यकता: सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिये भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जिसमें एनालॉग फैब्स की लागत 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक और एडवांस्ड-नोड फैब्स की लागत 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होती है।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में शीर्ष तक पहुँचने हेतु भारत के लिये विशिष्ट अवसर क्या हैं?
- एआई-संचालित चिप का डिज़ाइन: भारत अगली पीढ़ी के संचार नेटवर्क, स्मार्ट उपकरणों और डेटा सेंटरों के लिये ऊर्जा-कुशल चिप विकसित करने हेतु अपने मज़बूत AI तथा सॉफ्टवेयर टैलेंट का लाभ उठा सकता है।
- एडवांस्ड पैकेजिंग और चिपलेट्स: चूँकि एडवांस्ड पैकेजिंग के लिये वेफर फैब्रिकेशन की तुलना में कम निवेश की आवश्यकता होती है, इसलिये भारत चिप असेंबली, पैकेजिंग और चिपलेट प्रौद्योगिकियों के लिये एक वैश्विक केंद्र बन सकता है।
- GaN और SiC सेमीकंडक्टर्स: ये अगली पीढ़ी के चिप इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, पॉवर इलेक्ट्रॉनिक्स और 5G/6G दूरसंचार के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- विशेषीकृत RF (रेडियो फ्रीक्वेंसी) चिप: भारत वायरलेस संचार, आईओटी (IoT) उपकरणों, रडार प्रणालियों, उपग्रह संचार और रक्षा अनुप्रयोगों में उपयोग किये जाने वाले RF चिप विकसित कर सकता है।
- क्वांटम और न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग: चूँकि ये उभरती प्रौद्योगिकियाँ वैश्विक स्तर पर अभी भी अपने शुरुआती चरण में हैं, इसलिये भारत के पास विशेषज्ञता हासिल करने और 'फर्स्ट-मूवर एडवांटेज' (शुरुआती बढ़त का लाभ) पाने का अवसर है।
- किफायती मास-मार्केट चिप: भारत घरेलू और निर्यात दोनों बाज़ारों के लिये स्मार्टफोन, 5G/6G उपकरणों, माइक्रोकंट्रोलर्स, कैमरा सेंसर, चार्जर आईसी (IC) तथा अन्य उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के लिये लागत प्रभावी चिप के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत अपने मज़बूत टैलेंट पूल (प्रतिभाशाली कार्यबल), बढ़ते घरेलू बाज़ार और रणनीतिक हितों का फायदा उठाने के लिये एक निर्णायक मोड़ पर है, ताकि वह एडवांस्ड पैकेजिंग, कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स, मैटेरियल्स साइंस (सामग्री विज्ञान) और चिप डिज़ाइन में नेतृत्व के माध्यम से वैश्विक सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर सके।
"निष्क्रियता की लागत केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक भी है। भारत को अब कार्य करना चाहिये ताकि सेमीकंडक्टर्स (अर्द्धचालकों) को एक सामरिक कमज़ोरी से राष्ट्रीय शक्ति के स्रोत में बदला जा सके।" — नीति आयोग
mains practice प्रश्न. भारत अपनी 5P रणनीति का उपयोग करके विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण कैसे कर सकता है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वर्ष 2035 के लिये भारत का सेमीकंडक्टर विज़न क्या है?
भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक 120-150 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की एक ऐसी सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन (मूल्य शृंखला) का निर्माण करना है, जो डिज़ाइन, पैकेजिंग, मैच्योर नोड्स और रणनीतिक सामग्रियों में सुदृढ़ हो।
2. 5P सेमीकंडक्टर रणनीति क्या है?
5P का अर्थ है- पायनियरिंग, पॉलिसी एंड इनवेस्टमेंट, प्रोडक्शन, पीपल और पार्टनरशिप। ये पाँचों मिलकर भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के विकास का मार्गदर्शन करते हैं।
3. भारत के लिये एडवांस्ड पैकेजिंग और चिपलेट्स क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
ये वेफर फैब्स की तुलना में कम लागत वाला प्रवेश बिंदु प्रदान करते हैं और भारत को असेंबली, इंटीग्रेशन (एकीकरण) तथा वैल्यू एडिशन (मूल्यवर्द्धन) में वैश्विक मज़बूती हासिल करने में सक्षम बनाते हैं।
4. सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता हासिल करने में सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?
मुख्य चुनौतियों में उच्च पूंजीगत लागत, टैलेंट (प्रतिभाशाली कार्यबल) की कमी, अत्यधिक ऊर्जा और जल की खपत, तकनीकी जटिलता तथा वैश्विक बाज़ार का विश्वास शामिल हैं।
5. कौन-से सेमीकंडक्टर क्षेत्र भारत के लिये 'लीपफ्रॉगिंग' (तेजी से आगे बढ़ने) के सर्वोत्तम अवसर प्रदान करते हैं?
भारत एआई-संचालित चिप डिज़ाइन, एडवांस्ड पैकेजिंग, GaN/SiC चिप, आरएफ (RF) चिप, क्वांटम कंप्यूटिंग और किफायती मास-मार्केट (व्यापक बाज़ार के अनुकूल) चिप में नेतृत्व कर सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. निम्नलिखित में से किस प्रकार के लेज़र का उपयोग लेज़र प्रिंटर में किया जाता है? (2008)
(a) डाई लेज़र
(b) गैस लेज़र
(c) सेमीकंडक्टर लेज़र
(d) एक्साइमर लेज़र
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. भारत ने एक सेमिकंडक्टर विनिर्माण केंद्र बनने का लक्ष्य रखा है। भारत में सेमिकंडक्टर उद्योग के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? भारत सेमिकंडक्टर मिशन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। (2025)
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