राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (2023-24)
प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, आयरन फॉलिक एसिड, जननी सुरक्षा योजना, यू-विन, सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम, कुल प्रजनन दर, एनीमिया, मुक्त भारत रणनीति
मेन्स के लिये: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण में इसकी भूमिका, भारत में मातृ स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व
स्रोत: पीआईबी
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने वर्ष 2023-24 की अवधि के लिये 'राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6' (NFHS-6) के आँकड़े जारी किये हैं।
यह सर्वेक्षण मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल में एक महत्त्वपूर्ण चरण को रेखांकित करता है, जिसमें यह नोट किया गया है कि भारत में अब 90.6% जन्म स्वास्थ्य सुविधाओं (संस्थागत प्रसव) में होते हैं, जो देश को सार्वभौमिक सुरक्षित प्रसव कवरेज के और करीब ले जाता है।
सारांश
NFHS-6 मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण, परिवार नियोजन और महिला सशक्तीकरण में महत्त्वपूर्ण सुधारों को रेखांकित करता है, जो जेएसवाई (JSY), जेएसएसके (JSSK), पीएमएमवीवाई (PMMVY), पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan), यूआईपी (UIP) तथा आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से प्रेरित हैं।
यह सर्वेक्षण उभरती चुनौतियों को भी चिह्नित करता है, जिनमें सी-सेक्शन की दरों में वृद्धि, बढ़ता मोटापा और गैर-संचारी रोग (NCD), लगातार बनी हुई बाल कुपोषण की समस्या, एएनसी (ANC) निरंतरता में कमियाँ तथा अधिक मज़बूत निवारक स्वास्थ्य देखभाल तथा पोषण संबंधी रणनीतियों की आवश्यकता शामिल है।
NFHS-6 के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
मातृ स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व
संस्थागत प्रसव में उछाल: इसमें एक सकारात्मक बदलाव देखा गया, जो NFHS-5 के 88.6% से बढ़कर NFHS-6 में 90.6% हो गया, जो सार्वभौमिक कवरेज की ओर बढ़ते कदम को दर्शाता है।
कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की देख-रेख में होने वाले प्रसव की संख्या 89.4% से बढ़कर 91.3% हो गई, जबकि प्रसव के दो दिनों के भीतर नवजातों की प्रसवोत्तर देखभाल 79.1% से बढ़कर 85.3% हो गई।
प्रसव पूर्व देखभाल (ANC): कुल ANC पंजीकरण 95.9% तक पहुँच गया। पहली तिमाही में ट्रैकिंग 70% से बढ़कर 76.2% हो गई।
पोषण संबंधी पूरक: गर्भावस्था के दौरान 100 या अधिक दिनों तक आयरन फॉलिक एसिड (IFA) सप्लीमेंट का सेवन करने वाली माताओं की संख्या 44.1% से बढ़कर 54.9% हो गई और 180 या अधिक दिनों तक सेवन करने वाली माताओं की संख्या 26.0% से बढ़कर 37.8% हो गई।
प्रमुख योजनाएँ: जननी सुरक्षा योजना (JSY), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK), प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA/e-PMSMA), सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (SUMAN) तथा प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY 2.0) जैसी योजनाओं ने प्रसव पूर्व देखभाल, संस्थागत प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज में सुधार किया।
बाल स्वास्थ्य और पोषण
कुपोषण में गिरावट:
पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में बौनापन (उम्र के अनुसार कम लंबाई) 35.5% से काफी गिरकर 29.3% हो गया है।
अधिक दुबलापन (लंबाई के अनुसार अत्यधिक दुबलापन) 7.7% से तेज़ी से घटकर 5.2% पर आ गया।
पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कम वज़न का प्रसार 32.1% से घटकर 31.8% हो गया है।
इसके अतिरिक्त, स्तनपान के साथ-साथ पूरक आहार प्राप्त करने वाले 6-8 माह के बच्चों की हिस्सेदारी 45.9% से बढ़कर 59.5% हो गई है।
बाल टीकाकरण: बच्चों (12-23 महीने) में पूर्ण टीकाकरण कवरेज 83.8% से बढ़कर 87.1% हो गया है, जिसमें से 95.6% बच्चों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से टीके प्राप्त हुए।
बेहतर कोल्ड-चेन बुनियादी ढाँचे, यू-विन डिजिटल ट्रैकिंग और सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) से प्रेरित होकर, रोटावायरस टीकाकरण कवरेज 36.4% के साथ तेज़ी से बढ़कर 85.4% हो गया, जबकि खसरा युक्त टीके की दूसरी खुराक का कवरेज 58.6% से बढ़कर 71.8% हो गया।
बाल स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हुआ, जिससे तीव्र श्वसन संक्रमण (ARI) का प्रसार 2.8% से घटकर 1.9% हो गया।
स्तनपान की प्रथाएँ: छह माह से कम उम्र के 95.6% शिशुओं को विशेष रूप से स्तनपान कराया जाता है।
इसके अतिरिक्त, तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये स्तनपान की शीघ्र शुरुआत (जन्म के एक घंटे के भीतर) में लगभग 10 प्रतिशत अंकों का सुधार हुआ, जो NFHS-5 के 41.8% से बढ़कर NFHS-6 में 50.1% हो गया।
प्रमुख नीतिगत चालक: पोषण के क्षेत्र में ये लाभ 'एकीकृत बाल विकास सेवाओं' (ICDS) के तहत मज़बूत बुनियादी ढाँचे के सहयोग से पोषण अभियान (POSHAN), सक्षम आँगनवाड़ी और पोषण 2.0 (POSHAN 2.0) के माध्यम से नीतिगत अभिसरण द्वारा संचालित हैं।
जनसांख्यिकी रुझान
कुल प्रजनन दर (TFR): भारत की TFR 2.0 पर स्थिर बनी हुई है, जोकि 2.1 के अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्थापन-स्तर के जनसांख्यिकीय मानदंड से कम है, जो जनसंख्या स्थिरीकरण का संकेत देता है।
गर्भनिरोधक प्रसार दर (CPR): यह 66.7% से बढ़कर 69.1% हो गई है, जो परिवार नियोजन संबंधी सेवाओं तक बेहतर पहुँच को दर्शाती है और माताओं तथा बच्चों के स्वास्थ्य एवं कल्याण को बढ़ावा देती है।
महिला सशक्तीकरण और वित्तीय समावेशन
डिजिटल समावेशन में उछाल: इंटरनेट का उपयोग करने वाली महिलाओं का अनुपात लगभग दोगुना हो गया है, जो NFHS-5 के 33.3% से बढ़कर NFHS-6 में 64.3% हो गया है।
इसके अतिरिक्त, मोबाइल फोन रखने और उसका उपयोग करने वाली महिलाओं की संख्या 53.9% से बढ़कर 63.6% हो गई है।
वित्तीय सशक्तीकरण: आर्थिक स्वतंत्रता में वृद्धि की प्रवृत्ति देखी गई है; स्वयं के बैंक या बचत खाते का रखरखाव और संचालन करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 78.6% से बढ़कर 89.0% हो गया है।
मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन: युवा महिलाओं (15-24 वर्ष) में मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता के सुरक्षित तरीकों को अपनाने की दर में सुधार हुआ है, जो 77.6% से बढ़कर 79.2% हो गई है।
यह प्रगति संरचनात्मक रूप से 'राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम' (RKSK) के तहत मासिक धर्म स्वच्छता योजना (MHS) और 'प्रधानमंत्री भारतीय जनौषधि परियोजना' के माध्यम से मिलने वाले रियायती उत्पादों पर आधारित है।
स्वास्थ्य सुरक्षा का विस्तार: आयुष्मान भारत (PM-JAY) योजना के प्रभावी सहयोग से घरेलू स्वास्थ्य बीमा एवं वित्तीय जोखिम सुरक्षा कवरेज में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज़ की गई है, जो 41.0% से बढ़कर 60.2% हो गया है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)
परिचय: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) एक व्यापक, बहु-चरणीय सर्वेक्षण है, जो भारत भर में प्रतिनिधिक घरेलू नमूनों पर आधारित होता है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) की शुरुआत वर्ष 1992–93 में की गई थी और इसी अवधि में इसका पहला सर्वेक्षण आयोजित हुआ था। तब से अब तक पाँच चरण पूरे किये जा चुके हैं। NFHS-5 का आयोजन वर्ष 2019–21 में हुआ, जबकि NFHS-6 वर्ष 2023–24 को कवर करता है। यह सर्वेक्षण भारत में स्वास्थ्य, पोषण, प्रजनन क्षमता और परिवार कल्याण से संबंधित महत्त्वपूर्ण आँकड़े प्रदान करता है।
नोडल एजेंसी: भारतीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS), मुंबई को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में नामित किया गया है, जो समन्वय एवं तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करती है।
उद्देश्य: सरकार एवं अन्य एजेंसियों को स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण से संबंधित उच्च गुणवत्ता वाले ज़िला-स्तरीय आँकड़े उपलब्ध कराना, ताकि साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सहायता मिल सके।
NFHS-6 की मुख्य विशेषताएँ
विस्तारित कवरेज: इस सर्वेक्षण में 715 ज़िलों (मणिपुर को छोड़कर) में लगभग 6.79 लाख घरों का सर्वेक्षण किया गया।
प्रौद्योगिकी-आधारित प्रणाली: इसमें कंप्यूटर-सहायित व्यक्तिगत साक्षात्कार (CAPI) को पूर्ण रूप से अपनाया गया, जिससे वास्तविक समय में डेटा की पुष्टि और अधिक सटीकता सुनिश्चित हुई।
नए फोकस क्षेत्र: इसमें प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) कवरेज, स्वयं सहायता समूह (SHGs), डिजिटल साक्षरता तथा डिजिटल वित्तीय लेन-देन को शामिल किया गया।
उन्नत स्वास्थ्य मूल्यांकन: इसमें नैदानिक, मानवमितीय और जैव-रासायनिक (CAB) परीक्षणों का विस्तार किया गया, जिसमें HIV परीक्षण भी शामिल है।
NFHS-6 द्वारा उजागर की गई उभरती चिंताएँ क्या हैं?
सी-सेक्शन प्रसव में वृद्धि: शल्यक्रिया द्वारा किये जाने वाले सीज़ेरियन/सी-सेक्शन प्रसव में देशभर में असामान्य रूप से तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है। इसकी दर 21.5% से बढ़कर 27.2% हो गई, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित 10–15% की आदर्श सीमा से कहीं अधिक है।
निजी अस्पतालों में सीज़ेरियन प्रसव की दर 54.1% दर्ज की गई, जबकि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में यह केवल 16.9% रही। यह आँकड़ा निजी मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में लाभ-प्रेरित एवं व्यावसायीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है।
रोगों का दोहरा बोझ: भारत वर्तमान में कुपोषण और उभरती स्वास्थ्य समस्याओं के दोहरे संकट का सामना कर रहा है। एक ओर स्टंटिंग की दर में दीर्घकालिक गिरावट दर्ज की गई है, वहीं दूसरी ओर लगभग प्रत्येक तीसरा भारतीय बच्चा अभी भी दीर्घकालिक कुपोषण से ग्रस्त है। यह स्थिति पोषणयुक्त एवं विविध आहार की कमी तथा घरेलू खाद्य सुरक्षा में मौजूद चुनौतियों को उजागर करती है।
15–49 वर्ष आयु वर्ग के वयस्कों में अधिक वज़न (Overweight) और मोटापे (Obesity) की दर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
महिलाओं के मामले में मोटापे की व्यापकता 24% से बढ़कर 30.7% हो गई है, जिसमें शहरी महिलाएँ असमान रूप से अधिक प्रभावित हैं (जहाँ यह दर चिंताजनक रूप से 42.8% दर्ज की गई)। पुरुषों में भी मोटापे की दर 22.9% से बढ़कर 27.3% हो गई है।
गैर-संचारी रोगों (NCDs) में वृद्धि: उच्च रक्त शर्करा (मधुमेह) और उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) के मामलों में वृद्धि, मोटापे के बढ़ते प्रभाव के साथ देखी जा रही है। यह प्रवृत्ति इस बात का संकेत है कि भारत में संक्रामक रोगों से हटकर जीवनशैली-आधारित दीर्घकालिक (क्रॉनिक) स्वास्थ्य जोखिमों की ओर एक स्पष्ट बदलाव हो रहा है।
लगातार बनी हुई संवेदनशीलता: संरचनात्मक सुधारों के बावजूद, लगभग हर तीन में से एक भारतीय बच्चा अभी भी दीर्घकालिक कुपोषण (बौनापन) से प्रभावित है, जो यह दर्शाता है कि पोषण संक्रमण की गति को और तेज करने की आवश्यकता है।
देखभाल की निरंतरता: यद्यपि प्रारंभिक प्रसवपूर्व देखभाल (ANC) पंजीकरण की दर 95.9% है, फिर भी एक-तिहाई से अधिक गर्भवती महिलाएँ अनुशंसित न्यूनतम चार ANC यात्राएँ पूरी नहीं कर पाती हैं।
एनीमिया बायोमार्कर का विलोपन: NFHS-6 में रक्त-आधारित एनीमिया परीक्षण को आधिकारिक रूप से हटाए जाने की आलोचना की गई है।
इस जैव-चिह्न (बायोमार्कर) की अनुपस्थिति एनीमिया मुक्त भारत रणनीति की दीर्घकालिक निगरानी को कमज़ोर करती है, जिससे ज़मीनी स्तर पर आयरन-घाटे के रुझानों का सटीक आकलन करना कठिन हो जाता है।
आगे की राह
मातृत्व देखभाल के व्यावसायीकरण का विनियमन: सरकार को उन निजी अस्पतालों में, जहाँ सीज़ेरियन प्रसव (C-section) की दर लगातार विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित 10–15% की सीमा से अधिक है, अनिवार्य नैदानिक ऑडिट (Clinical Audit) लागू करना चाहिये। साथ ही, नर्स प्रैक्टिशनर मिडवाइफ कैडर का विस्तार करके सामान्य (प्राकृतिक) प्रसव को व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया जा सकता है।
गैर-संचारी रोगों (NCDs) की महामारी से निपटना: भारत में जीवनशैली-जनित रोगों के बढ़ते प्रसार को देखते हुए, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर अधिक कर जैसे राजकोषीय निरुत्साहन उपायों तथा भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा पैकेट के सामने अनिवार्य चेतावनी लेबलिंग (FOPL) को शीघ्र लागू किया जाना चाहिये, ताकि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में बढ़ते मोटापे पर नियंत्रण पाया जा सके।
सूक्ष्म-योजना के लिये AI का उपयोग: अधिकारियों को U-WIN डिजिटल डैशबोर्ड से प्राप्त रियल-टाइम डेटा का पूर्ण उपयोग करके उप-ज़िला स्तर पर टीकाकरण संबंधी कमियों की पहचान करनी चाहिये, जिससे आशा (ASHA) कार्यकर्त्ताओं को शेष लगभग 12% अल्प-टीकाकृत शिशुओं का पता लगाकर उनका टीकाकरण सुनिश्चित करने में सहायता मिले।
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाना: स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों (HWCs) को उन्नत डिजिटल उपकरणों से सुसज्जित किया जाना चाहिये, ताकि ज़मीनी स्तर पर मधुमेह और उच्च रक्तचाप की शीघ्र पहचान, निगरानी एवं प्रबंधन को प्रभावी बनाया जा सके।
निष्कर्ष
NFHS-6 मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण, परिवार नियोजन तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है, जो सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की दिशा में भारत की निरंतर प्रगति का प्रतिबिंब है। हालाँकि गैर-संचारी रोगों (NCDs) में वृद्धि, जीवनशैली से जुड़े जोखिम तथा कुपोषण और मोटापे के दोहरे बोझ जैसी चुनौतियाँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि निवारक स्वास्थ्य सेवाओं, व्यवहार परिवर्तन एवं संतुलित पोषण पर निरंतर एवं विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
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मेन्स प्रश्न:
प्रश्न. भारत में साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य नीति-निर्माण के लिये NFHS-6 के महत्त्व पर चर्चा कीजिये।
Ans:-
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