कीन्स के अर्थशास्त्र और समष्टि आर्थिक चुनौतियाँ UPSC IAS/IPS notes

1. केन्ज़ (Keynesian) का अर्थशास्त्र: बुनियादी सिद्धांत

केन्ज़ियन अर्थशास्त्र का मुख्य स्तंभ यह विचार है कि किसी भी देश में जीडीपी (GDP) और रोज़गार का निर्धारण मुख्य रूप से समग्र माँग (Aggregate Demand - AD) द्वारा किया जाता है।

समग्र माँग (Aggregate Demand) का सूत्र:

AD = C + I + G + X − M

यहाँ प्रत्येक घटक (Component) का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:

        C = Consumption (उपभोग): संतुष्टि या उपयोगिता प्राप्त करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं पर किया जाने वाला खर्च उपभोग कहलाता है। केन्ज़ के अनुसार, एक न्यूनतम स्तर (Non-discretionary consumption) को छोड़कर, उपभोग का स्तर पूरी तरह से आय (Income) के स्तर पर निर्भर करता है।

        यदि अर्थव्यवस्था में आय बढ़ती है, तो उपभोग भी बढ़ता है; और यदि आय कम होती है, तो उपभोग भी कम हो जाता है। आय में होने वाले परिवर्तनों की तुलना में उपभोग में होने वाले परिवर्तन हमेशा कम होते हैं, क्योंकि लोग बढ़ी हुई आय का एक हिस्सा भविष्य के लिए बचत (Saving) के रूप में रख लेते हैं।

        तकनीकी रूप से, यदि किसी व्यक्ति की आय को एक इकाई से बदला जाए, तो उसके परिणामस्वरूप उपभोग में होने वाले परिवर्तन को उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume - MPC) कहते हैं। केन्ज़ के अनुसार, MPC का मान हमेशा 1 से कम होता है (MPC = ΔC / ΔY < 1)

        गैर-विवेकपूर्ण उपभोग (Non-discretionary Consumption):यह उपभोग का वह मूलभूत स्तर है जो आय से स्वतंत्र होता है। यदि आय शून्य भी हो जाए, तब भी जीवित रहने के लिए यह न्यूनतम खर्च करना ही पड़ता है। इसके लिए व्यक्ति पुरानी बचत, सरकारी सहयोग या उधार (Loan) पर निर्भर करता है।

        I = Investment (निवेश): देश की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले खर्च को निवेश कहा जाता है। इसमें मशीनों, उपकरणों और बुनियादी ढाँचे पर किया जाने वाला खर्च शामिल है। ध्यान दें कि इसमें 'वित्तीय निवेश' (जैसे शेयर या बॉन्ड खरीदना) शामिल नहीं होता है।

        केन्ज़ के अनुसार, नियोजित निवेश (Planned Investment) पूरी तरह से ब्याज दर (Interest Rate) पर निर्भर करता है। जब ब्याज दर कम होती है (जैसे 5%), तब नियोजित निवेश का स्तर बढ़ जाता है (उदा. ₹300 करोड़) इसके विपरीत, जब ब्याज दर अधिक होती है (जैसे 15%), तब नियोजित निवेश का स्तर घट जाता है (उदा. ₹100 करोड़)

        G = Government Expenditure (सरकारी खर्च): यह सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था में किया जाने वाला कुल खर्च है। इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: निवेश प्रकार (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण, सड़कें, पुल) और उपभोग प्रकार (जैसे सब्सिडी, प्रशासनिक खर्च, वेतन) सरकारी खर्च का अर्थव्यवस्था की तात्कालिक आय और ब्याज दर से प्रत्यक्ष वित्तीय निर्भरता का कोई निश्चित संबंध नहीं होता है।

        X = Export (निर्यात): किसी देश के निवासियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं पर विदेशी निवासियों द्वारा किया जाने वाला कुल खर्च निर्यात कहलाता है।

        M = Import (आयात): किसी देश के निवासियों द्वारा विदेशी वस्तुओं और सेवाओं पर किए जाने वाले खर्च को आयात कहते हैं। केन्ज़ के अनुसार, एक न्यूनतम स्तर को छोड़कर किसी देश का आयात मुख्य रूप से उसकी जीडीपी (GDP) पर निर्भर करता है।

        ऐतिहासिक उदाहरण:आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार, वित्त वर्ष 2020-21 की पहली छमाही (H1) में कोविड-19 महामारी के कारण भारत की GDP में भारी गिरावट आई थी, जिसके परिणामस्वरूप भारत के आयात में भी भारी कमी दर्ज की गई थी।

2. अर्थव्यवस्था के प्रकार और समग्र माँग

        बन्द अर्थव्यवस्था (Closed Economy / Three-Sector Economy): यदि कोई अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (आयात-निर्यात) नहीं करती है, तो उसे बंद या क्रूसो अर्थव्यवस्था (Cruso Economy) कहते हैं। यहाँ समग्र माँग का सूत्र है: AD = C + I + G

        खुली अर्थव्यवस्था (Open Economy / Four-Sector Economy): जो अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार करती है, उसे खुली अर्थव्यवस्था कहते हैं। यहाँ शुद्ध निर्यात (Net Export - NX) को जोड़ा जाता है: AD = C + I + G + NX (जहाँ NX = X − M है)

3. प्रमुख समष्टि आर्थिक समस्याएँ (Macroeconomic Challenges)

अर्थव्यवस्था के आर्थिक चक्र में कई प्रकार की नकारात्मक स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिन्हें नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट किया गया है:

स्थिति (Status)

परिभाषा और विशेषताएँ

उदाहरण / व्यावहारिक समझ

1. स्लोडाउन (Slowdown)

यह वह स्थिति है जिसमें देश की GDP तो बढ़ती है, लेकिन उसकी वृद्धि दर (Growth Rate) लगातार कम होने लगती है।

यदि t₁ पर GDP ₹100 है, t₂ पर ₹105 (Growth: 5%) और t₃ पर ₹108 (Growth: 3%) हो जाए। यहाँ उत्पादन बढ़ रहा है पर रफ़्तार धीमी है।

2. संकुचन (Contraction)

यदि किसी भी एक तिमाही (Quarter) में आर्थिक विकास दर (Growth Rate) ऋणात्मक (Negative) हो जाए, तो इसे संकुचन कहते हैं। इसमें वास्तविक GDP कम होने लगती है।

यदि किसी वर्ष की पहली तिमाही (Q₁) की तुलना में दूसरी तिमाही (Q₂) में उत्पादन सीधे -5% गिर जाए।

3. मंदी (Recession)

यदि आर्थिक विकास दर (Growth Rate) लगातार कम से कम दो तिमाहियों (यानी लगातार 6 महीने) के लिए ऋणात्मक (Negative) बनी रहे, तो उसे तकनीकी रूप से मंदी कहा जाता है।

वित्त वर्ष 2020-21 की पहली और दूसरी तिमाही (Q₁ और Q₂) में भारत में तकनीकी मंदी देखी गई थी, जिसके बाद 'V-shaped' रिकवरी हुई।

4. अवсад (Depression)

जब मंदी की अवधि बहुत लंबी हो जाती है और उसके साथ-साथ वस्तुओं की कीमतों में निरंतर गिरावट (Deflation) जुड़ जाती है, तो उसे अवсад कहते हैं। (Depression = Recession + Deflation)

बाज़ार में माँग पूरी तरह समाप्त हो जाती है और बेरोजगारी चरम पर पहुँच जाती है।

 

महत्वपूर्ण अवधारणाएँ:

        मज़दूरी की नीचे की ओर अनम्यता (Wage-Stickiness): केन्ज़ के अनुसार, आर्थिक संकट के समय कंपनियाँ मज़दूरी या वेतन को आसानी से नीचे (कम) नहीं कर पाती हैं (श्रमिक संघों या अनुबंधों के कारण) इस अनम्यता के कारण कंपनियाँ खर्च घटाने के लिए कर्मचारियों को नौकरी से निकालने लगती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में बेरोज़गारी बहुत तेज़ गति से फैलती है। यही कारण है कि अर्थव्यवस्था के लिए इन्फ्लेशन (Inflation) को डिफ्लेशन (Deflation) की तुलना में बेहतर माना जाता है, बशर्ते वह एक नियंत्रित स्तर पर हो।

        मेल्टडाउन (Meltdown): वित्तीय बाज़ारों या शेयर बाज़ारों (Stock Markets) का बहुत भारी मात्रा में एकाएक गिरना, जिसे 'Big Crash' भी कहा जाता है, मेल्टडाउन कहलाता है।

4. भारत के मानव विकास संकेतक (Human Development Indicators)

मानव विकास रिपोर्ट (HDR) 2023/24 के अनुसार भारत की स्थिति और प्रमुख आंकड़े निम्नलिखित हैं:

        HDI मान (HDI Value):0.644 (यह भारत को मध्यम मानव विकास श्रेणी में रखता है)

        वैश्विक रैंक (Rank):134th (कुल 193 देशों में से)

        जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy at Birth):67.7 वर्ष

        स्कूल की प्रत्याशित वर्ष (Expected Years of Schooling):12.6 वर्ष

        स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष (Mean Years of Schooling):6.6 वर्ष

        वास्तविक प्रति व्यक्ति जीएनआई (Real Per Capita GNI): $6,951

        असमानता-समायोजित एचडीआई (IHDI):0.444

        प्लैनेटरी प्रेशर-समायोजित एचडीआई (PHDI):0.625

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UPSC CSE Mains - संभावित अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: "केन्ज़ियन अर्थशास्त्र के अनुसार, किसी अर्थव्यवस्था में रोज़गार और आय का स्तर समग्र माँग (Aggregate Demand) द्वारा निर्धारित होता है।" इस कथन के आलोक में समग्र माँग के विभिन्न घटकों की चर्चा कीजिए। साथ ही, स्पष्ट कीजिए कि मंदी (Recession) की स्थिति से निपटने में सरकारी व्यय (G) किस प्रकार एक उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है? (250 शब्द, 15 अंक)

उत्तर फ्रेमवर्क / दृष्टिकोण:


1.
भूमिका (Introduction): जे. एम. केन्ज़ के सिद्धांत को संक्षेप में बताते हुए समग्र माँग (AD) और रोज़गार के अंतर्संबंध को परिभाषित करें।
2.
मुख्य भाग (Body):
   - AD
के सूत्र (C + I + G + NX) को लिखते हुए उपभोग (C), निजी निवेश (I), सरकारी खर्च (G) और शुद्ध निर्यात (NX) को संक्षेप में समझाएँ।
   - '
मज़दूरी की नीचे की ओर अनम्यता' (Wage-Stickiness) का उल्लेख करते हुए मंदी में बेरोज़गारी बढ़ने का कारण स्पष्ट करें।
   -
यह समझाएँ कि मंदी में जब निजी उपभोग (C) और निजी निवेश (I) दोनों कम हो जाते हैं, तब केवल सरकारी व्यय (G) ही पंप-प्राइमिंग (Pump Priming) के माध्यम से माँग को पुनर्जीवित कर सकता है।
3.
निष्कर्ष (Conclusion): भारत के संदर्भ में (जैसे आत्मनिर्भर भारत पैकेज या हालिया इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च) एक संतुलित निष्कर्ष लिखें कि कैसे पूंजीगत व्यय आर्थिक चक्र को गति देता है।

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