Biotechnology (जैव-प्रौद्योगिकी) UPSC IAS Civil Services Examination | Science & Technology

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Biotechnology (जैव-प्रौद्योगिकी)

1. जैव-प्रौद्योगिकी: परिभाषाएँ (Definitions)

A. पुरानी परिभाषा (Traditional Definition)

जीवों के गुणों में परिवर्तन करने या उनमें नए गुणों के समावेशन के उद्देश्य से किए गए प्रयोगात्मक कार्यों और प्रयोगों को पारंपरिक जैव-प्रौद्योगिकी कहा जाता है।

B. आधुनिक परिभाषा (Modern Definition)

जीवों में आणविक स्तर (Molecular Level) परजैसे कि DNA, RNA या Protein में किए गए प्रयोगात्मक परिवर्तनों को आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी कहा जाता है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित आयाम शामिल हैं:

·         वर्तमान गुणों में ऐच्छिक परिवर्तन करना।

·         जीवों में नए गुणों का समावेशन (Inclusion) करना।

·         जैविक अणुओं का विस्तृत चित्रण और सामीक्षिति (Detailed Characterisation): जैविक संरचनाओं का गहराई से विश्लेषण।

·         कोशिकाओं के स्तर पर वैज्ञानिक प्रयोग: Cellular स्तर पर किए जाने वाले आधुनिक अनुसंधान।

2. DNA में स्थायी परिवर्तन की तकनीकें (Techniques for Permanent Changes in DNA)

DNA में स्थायी रूप से परिवर्तन करने के लिए मुख्य रूप से दो तकनीकों का उपयोग किया जाता है:

Recombinant DNA (rDNA) Technology

Gene Editing

·         उपलब्धता: यह तकनीक वर्ष 1972 से उपलब्ध है.

·         प्रक्रिया: इसके तहत किसी एक DNA में किसी अन्य (बाहरी) DNA भाग का स्थानांतरण और समावेशन किया जाता है.

·         कार्यप्रणाली:
Target DNA + Donor DNA → rDNA

·         प्रभाव: ग्राही (Recipient) DNA की आनुवंशिक सूचना बदल जाती है. इसके फलस्वरूप उस DNA से बनने वाला प्रोटीन भी बदल जाता है.

·         उदाहरण: Bacillus thuringiensis के cry gene के समावेशन से कपास में 'Crystal Protein' का संश्लेषण होने लगता है, जिससे Bollworm कीट के प्रति प्रतिरोधी क्षमता का विकास होता है.

·         उपलब्धता: यह आधुनिक तकनीक वर्ष 2017 से व्यावसायिक रूप से उपलब्ध है.

·         प्रक्रिया: इसमें DNA में किसी बाहरी DNA भाग का समावेशन नहीं किया जाता है.

·         कार्यप्रणाली: विशेष एन्जाइम और RNA की सहायता से DNA के क्षार युग्मों (Base Pairs) के क्रमों को उसी स्थान पर (In-situ) संपादित किया जाता है.

·         संपादन के प्रकार:
1. Addition (
जोड़ना)
2. Deletion (
हटाना)
3. Change (
परिवर्तन)

जीन संपादन की तीन प्रमुख प्रणालियाँ:

1.       CRISPR (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats): वर्तमान में सबसे अधिक प्रभावी और लोकप्रिय प्रणाली.

2.       ZFN (Zinc Finger Nuclease): जटिल/विशिष्ट यूकैरियोटिक DNA संपादन के लिए उपयुक्त.

3.       TALEN (Transcription Activator-Like Effector Nucleases): विशिष्ट यूकैरियोटिक DNA के संपादन हेतु उपयोगी तकनीक.

CRISPR प्रणाली के दो मुख्य भाग:

·         Guide RNA: लक्षित DNA (Target DNA) के सटीक स्थान की पहचान करता है.

·         Cas9 Enzyme: चिह्नित स्थान पर जाकर DNA को काटने और संपादन करने का कार्य करता है.

विशेषताएँ: इसमें संशोधन की विस्तृत संभावनाएँ हैं, प्रारंभिक प्रयोग इसी प्रणाली पर आधारित हैं तथा यह आसानी से उपलब्ध है.

3. ट्रांस-जीन एवं जीन थेरेपी (Trans-gene and Gene Therapy)

A. Trans-gene और Transgenic जीव

·         Trans-gene: rDNA तकनीक के तहत अधिकांश प्रयोगों में 'दाता (Donor)' और 'ग्राही (Recipient)' भिन्न-भिन्न प्रजातियों के होते हैं. ऐसी परिस्थितियों में स्थानांतरित किए गए जीन को Trans-gene कहा जाता है.

·         Transgenic जीव/कोशिका: सफल स्थानांतरण और समावेशन के बाद तैयार हुई ग्राही कोशिका या ग्राही जीव को Transgenic कहा जाता है.

·         Transgenic उत्पाद (GMO): Transgenic जीवों या कोशिकाओं से प्राप्त उत्पादों को Transgenic उत्पाद या Genetically Modified (GM) उत्पाद कहा जाता.

B. Gene-Therapy की विशेष परिस्थिति

जटिल आनुवंशिक रोगों के उपचार के लिए कुछ त्रुटिपूर्ण जीन एलील (Defective Gene-Allele) के बदले एक सामान्य जीन एलील का स्थानांतरण या समावेशन किया जाता है. यह सामान्य जीन एलील किसी स्वस्थ व्यक्ति से लिया जाता है और प्रभावित व्यक्ति या उसकी कोशिका में स्थानांतरित किया जाता है.

महत्वपूर्ण बिंदु: इस प्रक्रिया में यद्यपि rDNA विधि का ही इस्तेमाल होता है, परंतु जीन का स्थानांतरण एक ही प्रजाति (Human to Human) के दो सदस्यों के बीच होता है. इसलिए, जीन थेरेपी को rDNA की विशेष परिस्थिति माना जाता है और इसके द्वारा निर्मित व्यक्ति या कोशिका Transgenic नहीं कहलाती है.

4. Recombinant DNA (rDNA) तकनीक के चरण

4.       लक्ष्य निर्धारण (Targeting): इसके अंतर्गत दाता जीव, वांछित जीन, ग्राही जीव तथा उपयुक्त तकनीक/दृष्टिकोण का निर्धारण किया जाता है.

5.       जीन पृथक्करण (Gene Isolation): इसके लिए Restriction Endonuclease नामक एंजाइम का उपयोग किया जाता है, जिसे "आणविक कैंची" (Molecular Scissors) भी कहते हैं.

6.       Vector (वाहक) का चुनाव: वांछित जीन को ग्राही तक ले जाने के लिए उपयुक्त वाहक चुना जाता है.

7.       जीन + Vector को जोड़ना: पृथक किए गए जीन को Vector के साथ जोड़ा जाता है. इस कार्य के लिए Ligase एंजाइम का उपयोग किया जाता है. इसे r-Vector (Recombinant Vector) कहते हैं.

8.       r-Vector का ग्राही कोशिका में स्थानांतरण: तैयार Recombinant Vector को ग्राही कोशिका के भीतर प्रवेश कराया जाता.

9.       मशीन/जाँच: यह सुनिश्चित करना कि वांछित जीन सही प्रकार से ग्राही कोशिका में समाविष्ट होकर कार्य कर रहा है या नहीं.

5. वांछित जीन को स्थानांतरित करने से पूर्व प्राप्त करने की विधियाँ

वांछित जीन को आइसोलेट करने या तैयार करने की तीन मुख्य विधियाँ हैं:

विधि A: Genome के DNA से (From Genomic DNA) - इसमें Restriction Endonuclease एंजाइम की सहायता से पूरे जीनोम के DNA को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा (Cutting) जाता है. इसके बाद जीन की Probe द्वारा पहचान की जाती है.

विधि B: mRNA से (From mRNA) - इसमें Reverse Transcriptase एंजाइम की सहायता से mRNA को DNA में बदला जाता है. इस प्रकार निर्मित DNA को cDNA (Complementary DNA) या Copy DNA कहा जाता है.

विधि C: छोटे जीन के लिए (For Small Genes) - इसके लिए Synthesizer या Gene Machine का उपयोग करके कृत्रिम रूप से जीन का निर्माण प्रयोगशाला में किया जाता है.

Probe क्या है और इसके उपयोग:

Probe एक-सूत्री (Single-stranded) DNA या RNA का खंड होता है, जिसका एक निश्चित क्षार क्रम होता है. यह क्षार युग्मन के सिद्धांत के आधार पर अपने पूरक DNA की पहचान करता है. इसे किसी Dye या Radio-isotope द्वारा लेबल किया जाता है जिससे खोज संभव होती है.

मुख्य उपयोग: 1. मिश्रित DNA नमूनों में से विशिष्ट DNA अनुक्रम की पहचान करने में. 2. DNA प्रोफाइलिंग (DNA Fingerprinting) में.

6. Vector (वाहकों) का वर्गीकरण और चुनाव

Vector: यह वह DNA या RNA अणु है जिसकी सहायता से वांछित जीन को लक्षित कोशिका में सुरक्षित रूप से भेजा जाता है. वाहक का चुनाव दो मुख्य आधारों पर किया जाता है: (i) लक्षित कोशिका का प्रकार और (ii) जीन का आकार.

लक्षित कोशिका (Target Cell)

उपयोग किए जाने वाले Vector (वाहक) / तकनीक

जीवाणु (Bacteria)

Plasmid, Cosmid, Viral Genome, या Artificial Chromosome

पादप कोशिका (Plant Cell)

Agrobacterium tumefaciens (Ti-Plasmid), Viral Genome, या Vector-free DNA

जंतु कोशिका (Animal Cell)

Adenovirus, Retrovirus

7. Vector में वांछित जीन का संयोजन और स्थानांतरण

A. संयोजन की प्रक्रिया

सर्वप्रथम Restriction Endonuclease (R.E.) एंजाइम द्वारा वाहक (Vector) को एक विशिष्ट स्थान से काटकर खोला जाता है. इसके बाद Ligase एंजाइम की सहायता से खुले हुए Vector के साथ वांछित DNA (Target DNA) को जोड़ दिया जाता है. इस प्रकार Recombinant Vector तैयार होता है.

B. ग्राही कोशिका में Recombinant Vector भेजने की विधियाँ

·         जीवाणुओं में: CaCl₂ + Low Temperature उपचार, इलेक्ट्रोपोरेशन, या Virus की सहायता से.

·         पौधों में: Agrobacterium विधि, Gene Gun या Particle Bombardment (Biolistic तकनीक).

·         जंतुओं में: Adenovirus / Retrovirus, Micro-injection, या Liposome तकनीक.

8. ट्रांसजेनिक पौधों के लाभ (Advantages of Transgenic Plants)

10.   सूखे के प्रति सहनशीलता (Drought Tolerance): इन फसलों को बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है. जैसेअमेरिका में विकसित सोयाबीन तथा मक्के की किस्में.

11.   पादप रोगों के विरुद्ध प्रतिरोध (Disease Resistance): ये फसलें कवक और विषाणु जनित रोगों के प्रति प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधी होती हैं.

12.   कीट प्रतिरोध (Insect Resistance): फसलों को हानिकारक कीटों से बचाती हैं, जैसे— Bt Cotton (बीटी कपास) और Bt Brinjal (बीटी बैंगन).

13.   शीत सहनशीलता (Cold Tolerance): अत्यधिक कम तापमान और पाले को सहने की क्षमता.

14.   नए गुणों का समावेशन (Post-Harvest Quality): Flavr-Savr टमाटर (सड़ने/गलने की दर कम होती है) और Arctic Apple (काटने के बाद भूरा नहीं पड़ता).

15.   पोषण मूल्य में वृद्धि (Nutritional Enhancement): Golden Rice (विटामिन-A / Beta-carotene प्रचुर मात्रा में) और Edible Vaccines (खाद्य टीके जैसे केला, आलू, टमाटर).

16.   Weedicide या Herbicide सहनशीलता (खरपतवारनाशी सहनशीलता): खेतों में खरपतवार का प्रबंधन सरल होता है, जैसे— Glyphosate-प्रतिरोधी फसलें.

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