Assent to State Bills under Article 200 & 201: राज्य विधेयकों पर राज्यपाल की शक्तियां और सुप्रीम कोर्ट का फैसला | UPSC Polity Notes

 राज्य के विधेयकों को स्वीकृति (Assent to State Bills) और उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: UPSC राजव्यवस्था (GS Paper 2) विशेष नोट्स

UPSC Civil Services परीक्षा के दृष्टिकोण से केंद्र-राज्य संबंध (Center-State Relations) और राज्यपाल (Governor) की शक्तियां हमेशा चर्चा में रहती हैं. हाल ही में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने अनुच्छेद 143 के तहत मांगे गए 16वें राष्ट्रपति संदर्भ और तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल वाद में विधेयकों को स्वीकृति देने के मामले पर अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण राय दी है.

1. यह चर्चा में क्यों है? (Why in News?)
  • उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत विधेयकों पर अनुमति देने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल पर कोई समय-सीमा (Time-limit) लागू नहीं कर सकता.
  • 'मानित अनुमति' (Deemed Assent) अमान्य: कोर्ट ने कहा कि यह मानना गलत होगा कि समय-सीमा समाप्त होने पर बिल अपने आप पास मान लिया जाए. ऐसा करना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत (Separation of Powers) के खिलाफ होगा.

2. राज्य विधेयकों पर संवैधानिक प्रक्रिया (अनुच्छेद 200 और 201 का विश्लेषण)
जब राज्य विधान-मंडल कोई विधेयक पारित करता है, तो वह राज्यपाल के पास जाता है. संविधान के तहत निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है:
A. राज्यपाल की जिम्मेदारी (Article 200)
राज्यपाल के पास विधेयक पर 4 विकल्प होते हैं:
  1. सहमति देना: विधेयक तुरंत कानून बन जाता है.
  2. सहमति रोकना: विधेयक अस्वीकार कर दिया जाता है.
  3. पुनर्विचार हेतु वापस लौटाना (धन विधेयकों को छोड़कर): यदि विधान-मंडल इसे दोबारा पारित करता है, तो राज्यपाल को अनिवार्य रूप से सहमति देनी होती है.
  4. राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना: (जैसे- उच्च न्यायालय की शक्तियों को खतरा पहुंचाने वाले विधेयक).
B. राष्ट्रपति की शक्ति (Article 201)
जब राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेजता है, तो राष्ट्रपति:
  • सहमति दे सकते हैं, रोक सकते हैं या 6 महीने के भीतर पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकते हैं.
  • UPSC Key Point: यदि विधान-मंडल बिल को फिर से पारित करके भेजता है, तो राष्ट्रपति उस पर सहमति देने के लिए बाध्य नहीं हैं.

3. सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अन्य महत्वपूर्ण बिंदु (Tamil Nadu Case)
  • विधेयक पर राज्यपाल की निष्क्रियता असंवैधानिक: राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित (Pending) नहीं रख सकते. वे पॉकेट वीटो या आत्यंतिक वीटो का प्रयोग नहीं कर सकते.
  • परमादेश (Mandamus) रिट: राज्यपाल की निष्क्रियता को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. हालांकि, परमादेश रिट राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध सीधे जारी नहीं की जा सकती (अनुच्छेद 361 के तहत छूट), लेकिन उनके कार्यों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) हो सकती है.
  • विधानसभा द्वारा पुनः पारित विधेयक: राज्यपाल किसी विधेयक को केवल एक बार आरक्षित रख सकता है. पुनः पारित होने के बाद उसे दोबारा आरक्षित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें कोई बड़ा बदलाव न हो.
  • विवेकाधिकार सीमित: अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास पूर्ण विवेकाधिकार नहीं है. संविधान द्वारा निर्दिष्ट मामलों को छोड़कर अन्य मामलों में वे मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं.

4. राज्यपाल को संवैधानिक संरक्षण (Article 361)
  • अनुच्छेद 361 (1): राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग के लिए किसी भी न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं हैं.
  • अनुच्छेद 361 (2): राज्यपाल को अपने पद पर बने रहते हुए किसी भी आपराधिक कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति (Immunity) प्राप्त है.

📝 UPSC Mains Practice Question:
प्रश्न: "राज्यपाल द्वारा राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने या उन्हें लंबित रखने की शक्ति केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव का कारण बनती जा रही है।" उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्णयों के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए. (250 शब्द, 15 अंक)

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